मुंग बिखरने की रस्म शादी के लिए

माहेश्वरी परंपरा -शादी में ‘मूँग बिखेरने’ की पावन रस्म

​ स्क्रिप्ट की शुरुआत (The Introduction)

​(एक शांत और गरिमापूर्ण माहौल, बैकग्राउंड में वीणा या सितार का मधुर स्वर)

“जय श्री कृष्ण !

“शादी” एक ऐसा गठबंधन होता है कि दो परिवार आपस में जुड़ जाते हैं तथा अलग-अलग रस्मों और वादों से उसे उत्सव को बहुत ही आनंद और खुशी के साथ मनाते हैं और उन्हें आशीर्वाद के रूप में अलग-अलग कार्यक्रम के जरिए ढेरों शुभकामनाएं देते हैं।

इस तरह एक रस्म में है “मूंग बिखरने” की जो की माहेश्वरी समाज की परंपराएँ अपनी सादगी और संस्कारों के लिए जानी जाती हैं। दोनों परिवार एक दूजे से जुड़ने जा रहे हैं नए रस्मों में नए वादों में नये प्रेम के साथ खुलने वाले हैं! जिस तरह मेहंदी,  हल्दी, कुमकुम, बेवा, विवाह  आदि विवाह के कार्यक्रम होते हैं ।

इस तरह मुंह भी करना एक सुंदर रस्म होती है और उसे पूरी दिल से मनाया जाता है

इसी खुशी को बंधन को इन रस्मों से बांधकर हम अपने परंपराओं को निभाएंगे तो दोनों परिवार (surname) यहां जुड़ जाएंगे|

आज हमारे बीच आयोजित है— ‘मूँग बिखेरने की रस्म’। यह केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि परिवार की चार स्तंभ स्वरूप महिलाओं के बीच के तालमेल और प्रेम का दर्शन है। जब चार हाथ एक साथ मिलकर, एक ही लय में मूँग को थालियों में सहेजते हैं, तो वह दृश्य देखते ही बनता है।”

​💝रस्म का गहरा अर्थ (The Deep Meaning)

“माहेश्वरी संस्कृति में मूँग को ‘शुभ’ और ‘अक्षत’ की तरह पूजा जाता है। पांच या सात महिलाओं का साथ बैठना इस बात का प्रतीक है कि आने वाले कल में वर-वधु को,  परिवार के हर रिश्ते का साथ मिलेगा। एक थाली से दूसरी थाली में गिरते मूँग के दानों की ध्वनि, घर में आने वाली सुख-समृद्धि की आहट होगीं।”

​❣️ रस्म का दृश्य (The Ritual Visualization)

“देखिए, कितनी कुशलता से ये अनुभवी हाथ मर्यादा और प्रेम के साथ इस रस्म को निभा रहे हैं। वर वधू के सभी रिश्तेदार इसमें शामिल होते हैं।

जैसे की मां मासी, भुआ, दादी-नानी, हा वे जो भी परिवार की सुहागन स्त्रियां मिलकर कुमकुम टीका लगाकर, गीत गाते हुए एक सर्कल में एक गोलाकार में बैठकर सजी थाली को गोलाकार घूमते हुए मुंह बिखरते हैं। आपस में बैठे हैं आनंद से इस रस्म को पूरा करते हैं।

जिससे हमारी लाडली या  लाडली का जीवन हरा भरा मूंग जैसा रहे और चारों ओर खुशियां ही खुशियां फैले। यह विधि दर्शाती है कि गृहस्थी को कैसे सहेज कर रखा जाता है। जैसे मूँग के दाने आपस में मिलकर थाली भर देते हैं, वैसे ही हमारा परिवार खुशियों से भरा रहे।”

सुंदर कविता:

1*रिश्तों का संगम

​माहेश्वरी आँगन में आज,

संस्कारों की सजी है थाली।

मूँग बिखेरती सुहागनें मिलकर,

लाती हैं खुशहाली की लाली।।

​चार हाथ और एक ही लय,

रिश्तों का सुंदर मेल है।

एक थाली से दूसरी थाली तक,

यह प्रेम का पावन खेल है।।

​दाने-दाने में छुपा है आशीष,

बड़ों का स्नेह और मान है।

हमारी लाडो (या लाडले) के नए सफर का,

यही तो सबसे सुंदर सम्मान है।।


2*✨️मूंग बिखरने की आई है पावन बेला …

दूल्हे राजा आएंगे बांध के सेहरा…

सजेगी दुल्हन प्रेम होगा दोनों का गहरा…

ऐसा होगा मिलन, दो परिवार जुड़ जाएंगे एक संग…

खिल जाएगी दुल्हन नए परिवार से,

उसका होगा मिलन… खुशियों से महकेगा घर और आंगन ..

गहरा होगा दुल्हन की मेहंदी का रंग…

दोनों परिवार भर लो दिल में उमंग –!

–‐—परिवार और —-परिवार बंध जाओ प्रेमसे एक दूजे के संग…

इस रस्म को पूरा करते हुए; देते हैं उनको बधाई…

दो परिवार जुड़ गए,

चारों ओर खुशियां ही खुशियां छाई..!

इस मंगल अवसर की देते हैं बधाई..!!

“संस्कारों की यह धरोहर आपको कैसी लगी? अगर आपके परिवार में भी यह रस्म इसी तरह निभाई जाती है, तो अपनी यादें कमेंट्स में साझा करें और हमारी संस्कृति का मान बढ़ाएं। 🙏✨”

​”क्या आप जानते हैं कि मूँग के दाने एक थाली से दूसरी थाली में क्यों डाले जाते हैं? अपनी राय लिखें और इस रस्म के पीछे की कहानी दूसरों को भी बताएं! ❤️📝”जुड़ाव पैदा करने वाला|

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